नई दिल्ली: ईरान-इजरायल/अमेरिका युद्ध के कारण पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। इस युद्ध से पश्चिम एशिया में एनर्जी वार शुरू हो गया है। इसका खामियाजा भारत समेत दुनिया के कई देशों को भुगतना पड़ रहा है। पश्चिम एशिया में वार के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर चढ़ गई हैं। इससे दुनिया की अर्थवयवस्था को बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।बुधवार सुबह कच्चे तेल की कीमत में तेजी आई। हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट देखी गई। सुबह 10:30 बजे ब्रेंट क्रूड 2.30% की गिरावट के साथ प्रति बैरल 101 डॉलर से कुछ ज्यादा पर कारोबार कर रहा था। वहीं अमेरिकी क्रूड (WTI) में भी 3 फीसदी की गिरावट बनी हुई थी। इस गिरावट के साथ यह 93.21 डॉलर पर था। अब विशेषज्ञ इस बात की संभावना जता रहे हैं कि कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।होर्मुज नाकाबंदी ने बढ़ाई परेशानी
इस युद्ध के कारण ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नाकाबंदी कर दी है। यहां से तेल और और गैस से लदे गिने-चुने जहाजों को ही गुजरने दिया जा रहा है। खाड़ी देशों से आने वाला ज्यादातर तेल इसी रास्ते से आता है। भारत की जरूरत का करीब 50 फीसदी तेल भी इसी रास्ते से आता है। अगर इस रास्ते पर लंबे समय तक नाकाबंदी रहती है तो भारत समेत दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था मुश्किल में आ सकती है।भारत पर क्या असर?
ईरान यह युद्ध अब पश्चिम एशिया में एनर्जी वार के रूप में बदल गया है। इससे दुनिया में कच्चे तेल का संकट पैदा हो सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर तक पहुंचती है यह भारत की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा।
- कच्चे तेल में 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत में थोक महंगाई को लगभग 0.9% तक बढ़ा सकती है। वहीं 200 डॉलर का स्तर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों को दोगुना कर सकता है, जिससे माल ढुलाई और खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छूने लगेंगे।
- भारत का तेल आयात बिल काफी बढ़ जाएगा जिससे डॉलर की मांग बढ़ेगी। ऐसे में डॉलर के मुकाबले रुपया 95 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर सकता है।
- अनुमान है कि तेल की कीमतों में 30 डॉलर की वृद्धि भारत के चालू खाता घाटा (CAD) को GDP के 2.5% तक बढ़ा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा।
भारत ने उठाए ये कदम
खाड़ी देशों से आपूर्ति बाधित होने के कारण मार्च में रूस से कच्चे तेल का आयात 50% बढ़ गया है। भारतीय रिफाइनरियां अब भारी मात्रा में रूसी तेल को प्राथमिकता दे रही हैं। वहीं भारत ने अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा और अल्जीरिया जैसे देशों से तेल और गैस के नए सौदे किए हैं ताकि खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।