चन्दन श्रीवास (राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली)
इतिहास में पहली बार हुआ है,जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद सरकार बनने में इतना विलंब हुआ।
पहले कौन बनेगा मुख्यमंत्री?,उसके बाद दूसरी कवायद किस किस को मंत्री बनाया जाए? अब विभाग आवंटन में देरी के चलते प्रदेश में सरकार तो है, पर बे कार है,वो कुछ काम ही नहीं कर सकती।
बहरहाल देर आए दुरुस्त आए। कुछ ऐसे विधायक भी जीत कर आए हैं,जिनका ये चौथा या पांचवां टर्म है,और सियासी अनुभव भी मगर इस बार भी उन्हें मंत्री पद से महरूम रखा गया,वहीं कुछ ऐसे विधायक भी हैं,जिनकी लाटरी पहली बार में ही निकल गई। अर्थात ये कहना कठिन है कि,मंत्री मंडल गठन में किन2 आधारों को प्राथमिकता दी गई। अब महत्वपूर्ण विभागों के लिए माथा पच्ची, लॉबिंग शबाब पर है। ज़िम्मेदारी वाले विभागों के लिए क्या आधार होना चाहिए.? जो बड़े नेता केंद्र की सत्ता/संगठन से यहां भेजे गए हैं,उन्हें वरिष्ठ मान कर उम्मीद जताई जा रही है कि,उनको महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए जाने चाहिए। यद्यपि ये पैमाना ही बेतुका है। केंद्र और प्रांत की सियासत में ज़मींन आसमान का फ़र्क़ होता है। पैमाना तो ये होना चाहिए कि,प्रांत की सरकार में किस्का कितना अधिक अनुभव है।
इस आधार पर कई नेताओं का नाम सामने आता है,पर इसमें से कई चुनाव हार गए,और कई इस मंत्री परिषद का हिस्सा ही नहीं हैं। ऐसे में वो नाम महत्वपूर्ण हो जाते है,जो लगातार मंत्री पद का दायित्व निभाते रहे हैं। ,इनमें से एक नाम कुंवर विजय शाह का है। देखिए कुछ बातें कहने की नहीं होती,पर उनका महत्व तो होता है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में ही शासन-प्रशासन चलाने के गुण निहित हैं,जिसके चलते पूर्व में जिस विभाग का भी उन्हें दायित्व दिया गया,उसका उन्होंने सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। इस लेहाज़ से गृह विभाग की जवाबदारी उनके अनुकूल होगी। यदि ऐसा होता है,तो निश्चित रूप से प्रदेश की क़ानून व्यवस्था को एक नया आयाम मिलेगा।फिर विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री पद का उन्हें लंबा अनुभव भी रहा है। दूसरा ये कि विजय शाह मस्त मौला टाइप के व्यक्ति है,ये अपने काम के अलावा किसी खेमेबंदी में विश्वास ही नहीं करते इसीलिए दल में उनके सियासी विरोधी ढूंढने में भी दिक्कत होती है। ये भी एक बड़ा कारण है जिसका लाभ ये होगा कि,यदि उनको किसी बड़े मंत्रालय की ज़िम्मेदारी दी जाती है,तो विरोध की संभावना न के बराबर होगी।