कौन हैं भारतीय राजनयिक मैथिली आर ? जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की बोलती कर दी बंद; दिया करारा जवाब

Updated on 12-10-2026
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र की महासभा की छठी समिति (कानूनी मामले) की बैठक में भारत ने पाकिस्तान के उस दावे और बयानबाजी का मुंहतोड़ जवाब दिया है, जिसमें उसने कानून के शासन पर ज्ञान देने की कोशिश की थी। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में स्थाई मिशन की काउंसलर और कानूनी सलाहकार मैथिली आर. ने 'राइट ऑफ रिप्लाई' (जवाब देने का अधिकार) का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान को जमकर लताड़ लगाई। मैथिली आर. ने कहा कि जिस देश में 'सेना ही नियम है और सेना ही कानून', वह देश जब कानून के शासन की बात करता है तो यह बेतुका लगता है। तो चलिए जानते हैं कौन हैं भारतीय डिप्लोमेट मैथिली आर. जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान की बोलती बंद कर दी...

कौन हैं भारतीय डिप्लोमेट मैथिली आर?

मैथिली आर. एक भारतीय राजनयिक हैं जो न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की काउंसलर और कानूनी सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं। वह नवंबर 2024 से मिशन में इस पद पर हैं। वह 2014 बैच की भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी हैं। अक्टूबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति (कानूनी मामले) में पाकिस्तान को करारा जवाब देने के बाद उनकी जमकर तारीफ हो रही है।
उन्होंने इससे पहले 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की कानूनी समिति में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन (CCIT) को अपनाने की भारत की मांग को दोहराया था और उन देशों की आलोचना की थी जो आतंकवादी संगठनों का बचाव या उन्हें सही ठहराने के लिए राजनीतिक एजेंडे का इस्तेमाल करते हैं।

मैथिली आर ने पाकिस्तान को लगाई लताड़

मैथिली ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह न्यायपालिका की आजादी को कमजोर कर रहा है, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को मनमाने ढंग से जेल में डाल रहा है, एक लोकप्रिय पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक रहा है और लोगों के अधिकारों व प्रेस की आजादी पर रोक लगा रहा है। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को लेकर पाकिस्तान के भारत पर लगाए गए आरोपों को भी खारिज किया और पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' का बचाव करते हुए इसे 'सोचा-समझा, उचित और लक्षित जवाब' बताया।
उन्होंने कहा कि जो देश अपने सैन्य शासकों को अपनी ही अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखता है, वह इस समिति में कानून के शासन पर उपदेश देने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने पाकिस्तान के 26वें संवैधानिक संशोधन को न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा झटका बताया। इस संशोधन ने पाकिस्तान की न्याय प्रणाली के ढांचे और कामकाज में महत्वपूर्ण संस्थागत बदलावों का रास्ता साफ किया।

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