IWT: 'भारत आतंकवाद का नाम लेकर नहीं रोक सकता सिंधु का पानी', डच एक्सपर्ट ने बताया पाकिस्तान क्या करे?
Updated on
23-09-2026
इस्लामाबाद: भारत, आतंकवाद का हवाला देकर सिंधु जल संधि को एकतरफा सस्पेंड नहीं कर सकता है। ये कहना है विलेम वैन ड्यूरसेन का जो एक सीनियर डच इंडिपेंडेंट वॉटर मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं। विलेम वैन ड्यूरसेन डिप्लोमेट भी रह चुके हैं। उन्होंने पाकिस्तानी अखबार फ्राइडे टाइम्स में एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है 'सिंधु जल संधि कोई अहसान नहीं है।' उन्होंने इसके अलावा लिखा है कि हेग कोर्ट ने सिंधु जल संधि को लेकर बिल्कुल साफ और स्पष्ट भाषा में अपना फैसला सुनाया था लेकिन उसे भारत खारिज कर चुका है लेकिन भारत के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं था।आपको बता दें कि भारत ने जब से सिंधु जल संधि को सस्पेंड किया है उसके बाद से पाकिस्तान दुनिया भर में इस समझौते की फिर से बहाली के लिए गुहार लगा रहा है। पाकिस्तान इसके लिए जमकर लॉबी कर रहा है और पैसे देकर लेख लिखवा रहा है। दुनिया में, खासकर यूरोपीय देशों में सैकड़ों की संख्या में ऐसे कथित एक्सपर्ट्स हैं जो पैसे लेकर लेख लिखते हैं। पाकिस्तान हमेशा से ऐसे नैरेटिव बनाने में माहिर रहा है। जबकि भारत ने साफ कह रखा है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों को भेजना बंद नहीं करता तब तक सिंधु जल संधि की बहाली नहीं होगी।अदालत के आदेश के बावजूद भारत का सख्त रुख
विलेम वैन ड्यूरसेन ने लिखा है कि अप्रैल 2025 में कश्मीर में एक हमले में 26 आम लोग मारे गए। भारत ने, दोषियों को पाकिस्तान से जोड़ते हुए ट्रीटी को रोक दिया और मांग की कि सहयोग फिर से शुरू होने से पहले पाकिस्तान 'भरोसेमंद तरीके से और पक्के तौर पर' बॉर्डर पार आतंकवाद को सपोर्ट देना बंद करे। इसके बाद से ये संधि एक अजीब एडमिनिस्ट्रेटिव उलझन में है। इसे न तो इसे औपचारिक रूप से खत्म किया गया है क्योंकि संधि में कोई एग्जिट क्लॉज नहीं है और इंटरनेशनल कानून भारत को एकतरफा सस्पेंशन का कोई आधार नहीं देता है और न ही यह असल में काम कर रही है।सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को क्या सलाह दी?
उन्होंने पाकिस्तान को कोलोराडो नदी का उदाहरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि अमेरिका में 1922 से 7 राज्य कोलोराडो नदी का पानी आपस में साझा कर रहे हैं। वहां भी आपसी सहमति का तंत्र कमजोर पड़ने लगा है। नेवाडा राज्य ने संघीय सरकार के खिलाफ अदालत में केस दर्ज करा दिया, क्योंकि बातचीत का पुराना तरीका काम नहीं कर रहा था। इसीलिएदुनिया में जहां भी नदियों के समझौतों में दिन-प्रतिदिन का सहयोग यानि डेटा साझा करना, नियमित बैठकें रुक जाता है वहां अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला भी बेअसर साबित होता है।उन्होंने लिखा है कि हेग की अदालत का फैसला कानूनी रूप से सही हो सकता है लेकिन वह जमीनी स्तर पर दोनों देशों को जबरन सहयोग करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। उन्होंने पाकिस्तान को सलाह दी है कि किसी बड़े और नए समझौते की जगह छोटे और जमीनी कदमों से शुरुआत करनी होगी। बिना किसी बड़े राजनीतिक हंगामे के अधिकारियों की नियमित बातचीत शुरू करने पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने लिखा है कि कश्मीर का विवाद और नदी का प्रबंधन दो अलग बातें हैं और नदी प्रबंधन शुरू करने के लिए कश्मीर विवाद का सुलझना पूर्व शर्त नहीं हो सकता।
अन्य महत्वपुर्ण खबरें