भारत की RAW और इजराइली मोसाद, 58 सालों में कैसे बनी दुनिया की सबसे खतरनाक सीक्रेट जोड़ी?

Updated on 22-09-2026
नई दिल्ली/तेल अवीव: पाकिस्तान के खिलाफ 1965 की लड़ाई के दौरान भारत के खुफिया तंत्र पर गंभीर सवाल उठे थे। इसके बाद 21 सितंबर 1968 को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW at 58) की स्थापना की गई थी। इसका मकसद एक ऐसी खुफिया एजेंसी का निर्माण करना था जो बाहरी खतरों से सरकार को पहले ही आगाह कराए। एजेंसी के पहले प्रमुख आर.एन. काओ ने R&AW (Research and Analysis Wing) नाम से एक ऐसा संगठन बनाया जो तीन साल के भीतर 1971 में बांग्लादेश में अपना झंडा गाड़ दिया।

पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद करवाने में R&AW की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। अब 58 साल बाद R&AW कहीं ज्यादा जटिल जियोपॉलिटिकल माहौल का सामना कर रहा है। हाइफा यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिलेशंस डिपार्टमेंट से पीएचडी कर रहे फॉरेन पॉलिसी एनालिस्ट वासु शर्मा ने टाइम्स ऑफ इजरायल में रॉ और मोसाद (RAW Mossad Connection) के ऊपर एक दिलचस्प लेख लिखा है। उन्होंने रॉ और इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के बीच वर्षों से चले आ रहे दिलचस्प सहयोग के बारे में बताया है।
उन्होंने लिखा है कि रॉ और मोसाद के गठबंधन को जान बूझकर सीक्रेट रखा गया ताकि उसपर राजनीति का असर ना हो। लेकिन दोनों एजेंसियों के बीच का तालमेल लगातार मजबूत हुआ है और अब चुनौती यह है कि क्या गुप्त सहयोग पर आधारित यह रिश्ता अब एक ज्यादा व्यवस्थित इंटेलिजेंस पार्टनरशिप में बदल सकता है जो खतरों के इस आपस में जुड़े हुए माहौल के लिए सही हो।


रॉ और मोसाद के बीच तालमेल कितना पुराना

वासु शर्मा ने लिखा है कि RAW और मोसाद के बीच सहयोग की शुरुआत रॉ के बनने के लगभग साथ ही हुई थी। 1960 के दशक के आखिर में रॉ प्रमुख आरएन काओ ने इजरायली खुफिया एजेंसी के साथ संबंध बनाए क्योंकि दोनों देश पाकिस्तान, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सुरक्षा संबंधों को लेकर चिंतित थे। ये चिंताएं तब और बढ़ गईं जब ऐसी खबरें आईं कि पाकिस्तान, चीन की मदद से ईरानी और लीबियाई लोगों को उत्तर कोरियाई हथियारों को इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देने की कोशिश कर रहा था।
काओ के मुताबिक इजरायल के साथ सहयोग से भारत को एक अहम खुफिया पार्टनर मिला जिसे इन नेटवर्कों का पता लगाने का अनुभव था। इस सहयोग ने भारत और इजरायल के बीच एक गुप्त चैनल बनाने में भी मदद की और यह सब 1992 में दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध बनने से कई साल पहले हुआ था। 1977 में मोसाद ने ही भारत को बताया था कि पाकिस्तान कहूता में परमाणु हथियार बना रहा है। उस वक्त इजरायल के रक्षा मंत्री एजर वीजमैन ने भारत का गुप्त दौरा किया था जिसे रॉ और मोसाद की बैक-चैनल कूटनीति के जरिए व्यवस्थित किया गया था।
इस दौरान इजरायल ने भारत को पाकिस्तान पर साथ मिलकर हमला करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन भारत तैयार नहीं हुआ। उस हमले के लिए इजरायल अपने लड़ाकू विमानों से हमला करने वाला था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इजरायल के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हालांकि इसके बाद भी मोसाद, भारत के साथ पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की संवेदनशील जानकारियां साझा करता रहा।


जब दिल्ली में मोसाद के लिए बनाया गया स्टेशन

1980 के दशक तक रॉ और मोसाद के बीच का तालमेल काफी बढ़ चुका था।1988 में रॉ ने दो फ्रंट कंपनियां बनाईं। इनके नाम रखे गये पीयूष इन्वेस्टमेंट्स और हेक्टर लीजिंग एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड। इन कंपनियों का प्रचार मिनरल्स, गाड़ियों, टेक्सटाइल और स्पेयर पार्ट्स का व्यापार करने वाली फर्मों के तौर पर किया गया था। इनके डायरेक्टर रॉ के दो बड़े अधिकारियों को बनाया गया। मार्च 1989 में इन फर्मों ने नई दिल्ली के हैली रोड पर गौरी सदन में दो घर खरीदे गये जहां 1989 से 1992 तक मोसाद का स्टेशन चीफ रहा।
मोसाद का वह अधिकारी जिसके पास अर्जेंटीना का पासपोर्ट था वो अपने भारतीय समकक्षों के साथ खुफिया जानकारी और ऑपरेशन से जुड़ी जानकारी का आदान-प्रदान करता था। एक महत्वपूर्ण घटना जून 1991 की है जब जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने एक इजरायली पर्यटक का अपहरण कर लिया था। बातचीत की देखरेख मुख्य रूप से मोसाद के अधिकारी और दिल्ली भेजे गए एक इजरायली राजनयिक ने की थी। इससे पता चलता है कि असल में भारत और इजरायल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध बनने से पहले ही खुफिया एजेंसियों के बीच के इस रिश्ते ने अपना इंफ्रास्ट्रक्चर और चैनल बनाना शुरू कर दिया था।

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